Saturday, July 10, 2010

बंद महंगा या महंगाई

भी कुछ ही दिन पहले बंद हुआ था, भारत बंद था, यानी पूरा देश ठप्प. महंगाई को लेकर "एंटी सरकार" के लोगों ने पुरे देश को ठप्प कर दिया था। दाना-पानी बंद, आना-जाना बंद, रोड बंद, स्कूल बंद, ऑफिस बंद, ये सब हुआ था बढती महंगाई के विरोध में। आज फिर बंद था, पर अबकी बार भारत नहीं बस पूरा सूबा बंद था। लालू और रामविलास की पार्टी के लोगों ने बंद किया था। सप्ताह भर पहले के बंद के बाद लोगों ने थोड़ी राहत की सांस ली ही थी कि फिर से महंगाई के खिलाफ बंद. महंगाई भले ही कम हो नहीं हो, बंद नहीं बंद है!

अब लोग महंगाई से तो परेशान थे ही रोज रोज होने वाले बंद ने उनकी परेशानी कुछ ज्यादा ही बढ़ा दी है। प्रदर्शन के इस तरीके से लोगों का भला हो नहीं हो, महंगाई का जरूर भला होगा। जिसके विरोध में आये दिन बंद और प्रदर्शन हो रहे हैं, इस कदम से "उसमे" और एक्रीमेंट ही हो रहा है। बंद का आयोजन गरीब जनता कि "भलाई" के लिए किया गया, पर जिनके इशारों या लीडरशिप में बंद होता है, वो रात दिन हवादार गाड़ियों में घुमते हैं, ऐसी गाड़ियाँ जिसमे बैठकर आपको पता भी नहीं चलेगा कि गर्मी का मौसम है। ये लोग आमलोगों के उस दर्द को क्या जाने, जब बंद के कारण गाडी नहीं मिलने पर ये घंटो धुप में खड़े रहते हैं। सुबह-सुबह घर से खाना-पीना खाकर बंद करने वालों को उनका दर्द भी नहीं दीखता है, जिन्हें बंद के कारण भूखे रहना पड़ता है। बंद करने वालों को को इसकी फिकर थोड़े ही रहती है, इन्हें बस बंद को इसलिए सफल बनाना है कि आमलोगों से सरकार तक को लगे कि इनकी ताकत बहुत है। महंगाई के खिलाफ इस बंद से किसका भला होगा, उसका जिसने घर पहुचने के लिए १० के बदले २५ रुपये खर्च किये या उसका जिसे सुबह का खाना भी नसीब नहीं हुआ, मेरी नज़र में उसका भी भला नहीं हुआ होगा जिसका रोज के 10-0 रुपये के बिजनेस से खुद का और पुरे परिवार का पेट भरता है, शायद उसका भी नहीं जिसका एक दिन का स्कूल या कोचिंग छूट गया...! तो फिर इस महंगाई के खिलार बंद का लाभ किसे मिलेगा, पार्टी के दिन रात एक कर काम करने वाले कार्यकर्ता को और पार्टी के महामहिम नेता जी को जो ये दिखाना चाहते हैं की जनता उनके साथ है। अब भले ही जनता डर के मारे उनका साथ क्यू दे, पर साथ है तो साथ है।
आज के बंद की एक और ख़ास बात ये रही की जिनके लीडरशिप में बंद का आयोजन किया गया, दोनों रेलवे मिनिस्टर रह चुके हैं। और ये शायद बताने की बात नहीं है की बंद का असर सबसे ज्यादा रेलवे पर ही पड़ता है। जहा मन हुआ ट्रेन रोक दिया, जहा मन हुआ ट्रैक उखाड़ फेंका, कोई पूछने वाला थोड़े ही है, सरकार की संपत्ति मतलब अपनी जायदाद।
बहरहाल इस बंद से, तो रामविलास जी कोई फर्क पड़ेगा और ही लालू जी को। उनके घर महंगाई का असर तो पहले था और ही अब ही होगा। और तो और बंद करने वाले हजारो कार्यकर्तायों को भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा। जिसने अच्छी भीड़ जुटी होगी, उसकी इज्जत नेता जी के सामने और ज्यादा बढ़ गयी होगीअसर तो उनको पड़ा जिसकी कोचिंग छूट गयी, जिसका २० के बदले ६० खर्च करना पड़ा, दवा नहीं milne के कारन जिसका ऑपरेशन नहीं हो सका, जो टाइम पर अपने घर नहीं पहुच सका, टाइम पर खाना नहीं खा सका, जिसकी कमाई चौपट हो गयीये तो एक दो एग्जाम्पल दे रहे हैं, ऐसे कितने लोग होंगे, जिनके काम को इस बंद ने और भी महंगा कर दिया......! अब आप बताइए बंद महँगा हुआ या महंगाई......!

Thursday, July 8, 2010

ऑक्टोपस बाबा की जय हो

खिरकार एक बार फिर से बाबा का "सपना" सच हो गया। बाबा की भविष्यवाणी सच होने के बाद स्पेन के लोग जहाँ ऑक्टोपस बाबा की जय-जयकार कर रहे हैं, वही जर्मनी के लोग बहुत नाराज़ हैं, क्योंकि अपने बाबा ने ही इन सबका दिल तोड़ दिया. स्पेन ने अपने फूटबाल के इतिहास में एक नया चैप्टर जोड़ते हुए जर्मनी को १-० से हराकर फीफा वर्ल्ड कप के फ़ाइनल में एंट्री कर ली। पुयोल ने बाबा का सपना सच करते हुए ३ बार की चैम्पियन जर्मनी को शिकस्त देकर अपने देशवासियों का गजब का धांसू मान बढाया है। हालाकि वर्ल्ड कप में 1934 से भाग ले रहे स्पेन को १३वे प्रयास में यहाँ तक आने में सफलता मिली है। फूटबाल के इस महाकुम्भ में ११ जुलाई को उसका मुकाबला हालैंड से होगा.
बाबा ऑक्टोपस की भविष्यवाणी अब तक ५ मैच में सही बैठी है। होता यू है कि जर्मनी के मैच के पहले बाबा के सामने ग्लास का ३ डब्बा रखा जाता है। १ में जर्मनी और दुसरे में विपक्षी टीम का झंडा लगा रहता है। "पाल" जिस डब्बे के ऊपर बैठते हैं, उसी टीम की जीत मानी जाती है। इस से पहले भी पाल की भविष्यवाणी सही साबित हुई है। हालाकि वैज्ञानिक और पेटा के लोग मानते हैं कि पाल की भविष्यवाणी महज एक संयोग है और कुछ nahi।
जो भी हो ऑक्टोपस कि भविष्यवाणी ने स्पेन से भले ही पेन को अलग कर दिया हो, पर जर्मनी के लोगो के दिल का दर्द बहुत बढ़ा दिया है... वेल, फूटबाल के इस महाकुम्भ में बहुत कुछ उलट-फेर देखने को मिला, तो कुछ ऐसे अजूबों के भी दर्शन हुए, जिसे सालों तक याद रखा जाएगा। अब फ़ाइनल मैच के बारे में ऑक्टोपस बाबा क्या बोलते हैं, उनका कहा कितना सच होगा, ये तो वक्त ही बताएगा, पर बाबा ने रोमांच से भरे इस धक्-धक् खेल में अचानक से हाई वोल्ट जान दाल दी।

Wednesday, July 7, 2010

लम्बे बाल, छोटे बाल और साक्षी


महेंद्र सिंह धोनी ने इंडियन टीम में एंट्री की थी तो न तो क्रिकेट पंडित और न ही क्रिकेट के फैन्स को ही पता था कि खेल के मैदान में चौका-छक्का लगाने वाला माही एक दिन इंडियन टीम का लीडर तो बनेगा ही साथ ही इतना हॉट केक बन जायेगा कि उसके छोटे-छोटे बाल भी "बिकेंगे" । किसी ने भले ही नहीं सोचा था पर माही ने सबकुछ कर डाला। बल्ले से जमकर रन की बरसात की ही विज्ञापन की दुनिया में भी खूब धूम मचाया। मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर के बाद मैदान के बहार से नोट कमाने वाले खिलाड़ी भी बन गए। बात क्रिकेटर्स के बिग बॉस बन्ने की हो या ऑस्ट्रलियन टीम को धुल चटाने की माही ने हर जगह अपना झंडा बुलंद किया।
अब जिसकी मैदान में "जय हो" होगी, वह अपनी लाइफ में कैसे चुप-चुप रहेगा। २०-२० फटाफट क्रिकेट के ब्लास्टर माने जाने वाले धोनी ने अपनी लाइफ के खेल को भी इतना फास्ट खेला कि किसी को कानो-कान खबर तक नहीं लगी। चट मंगनी पट व्याह रचा लिया और वो भी अपने बचपन की दोस्त के साथ। यूं तो धोनी का नाम दीपिका पादुकोण, आसीन आदि के साथ जोड़ा जा रहा था, पर धोनी ने सबका दिल तोड़ते हुए, बचपन की दोस्ती को प्यार में बदल दिया।
धोनी के लम्बे बाल को छोटा-छोटा करने वाली उनकी बेगम साक्षी सिंह रावत ने ऐसी बाज़ी जीत ली, जो उनके लिए वर्ल्ड कप जीतने जैसा है। पर, धोनी बाबा का असल एक्साम तो अब होने वाला है। १८ जुलाई से श्री लंका में ३ टेस्ट मैच की सेरिएस होनी है। चुप-चाप शादी के बाद अब ब्लास्टर धोनी श्रीलंका में क्या धमाका करने वाले हैं, ये तो वक़्त बताएगा........पर कुछ भी हो धोनी के लम्बे बाल, छोटे बाल और फिर अचानक से स्कूल की दोस्त का हमसफ़र बन जाना उनके फैन्स को हमेशा याद रहेगा.................

Tuesday, July 6, 2010

महंगाई से भी महंगे हैं मोदी

एक दिन के भारत बंद से जनता बदहाल हो गयी। १३ हज़ार करोड़ का चुना लगा तो करीब आधे से ज्यादा बिजनेस भी चौपट हो गया। पूरे देश में गिरफ्तारी तो हुई है तो तोड़फोड़ भी कम नहीं हुए। अपने बिहार में भी महंगाई को लेकर खूब धरना प्रदर्शन हुए, प्रदर्शनकारी रोड पर निकले तो पुलिस ने खूब लाठियां बरसाई. इन सबके बीच एक ऐसा चेहरा था, जो इस कमरतोड़ महंगाई से भी महंगा दिख रहा था। वो थे नरेन्द्र मोदी......! महंगाई से लड़ने के लिए भाजपा और जदयू के कार्यकर्ता आपस में ही भीड़ गए। पीएम का पुतला फूकते-फूकते भाजपा के कार्यकर्ता नीतीश का पुतला फूंक दिए। पटना हो या भागलपुर हर जगह विरोध करने वाले आपस में ही लड़ने लगे। इस बंद में महंगाई का मुद्दा गायब हो गया पर यहाँ भी मोदी छाये रहे। अब आप ही बताइए के महंगाई से महंगे हैं न मोदी............

Saturday, January 2, 2010

फिर एक नया साल

क्या नया क्या पुराना

फिर एक नया साल, फिर एक उम्मीद, फिर एक आशा, फिर एक सपना। देखते-देखते 365 दिन कैसे बीत गए पता ही नहीं चला। लगा जैसे सुबह के बाद पुरे दिन कुछ करते रहे और फिर रात के अंधियारे के बाद वो सुबह आ गयी जिसे हमलोग नया साल कहते हैं।
2010 की पहली सुबह मैंने न तो सूरज की किरणों को देखा, न ही किसी को नव वर्ष की शुभकामनाये दी। क्योंकि मैं जनता हु की नया पुराना कुछ नहीं होता, वो तो बस दिल में छुपा एक एहसास होता है, जिसे लोग एक-दुसरे को जताते हैं ।