क्या नया क्या पुराना
फिर एक नया साल, फिर एक उम्मीद, फिर एक आशा, फिर एक सपना। देखते-देखते 365 दिन कैसे बीत गए पता ही नहीं चला। लगा जैसे सुबह के बाद पुरे दिन कुछ करते रहे और फिर रात के अंधियारे के बाद वो सुबह आ गयी जिसे हमलोग नया साल कहते हैं।
2010 की पहली सुबह मैंने न तो सूरज की किरणों को देखा, न ही किसी को नव वर्ष की शुभकामनाये दी। क्योंकि मैं जनता हु की नया पुराना कुछ नहीं होता, वो तो बस दिल में छुपा एक एहसास होता है, जिसे लोग एक-दुसरे को जताते हैं ।